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बैताल बोला, "सुनो शजा विक्रमादित्य एुक समय की बात है किवाराणसी में प्रताप मूकुट नाम का एक अत्यंत प्रतापी राजा राज्य करताथा। उसके पुत्र बेटे का नाम रत्नशाज था । दोनों में वड़ी गहरी मित्रता थी वह प्राय:साथ २हते और साथ शिकार क्ररने के लिए जंगल जाया कश्ते थे एकसमय की बात है, दोनों जंगल में शिकार खेलने गए । शिकार खेलते-खेलते दोनों एक-दूसरे से बिद्ुड़ गए । वज्मुकुट एक और चला गया,Ccराज दूसरी ओर चला गया। दोनों के घोड़े हवा सें बातें कर रहे थे ।कोनों हिणों का पीछा कर रहे थे बहुत दूर निकल जाने पर वज्रमुकुटकी ध्यान आया कि वह काफी अआठो आ गया है, उसको लौट चलनाचाहिए। वजमुकुट लौट रहा था कि रास्ते में उसे एक महल दिखाई पड़ा ।वह महल की सुवरता देखता ह ठाया । वह महल क़िसी शाजा का था।महल के घगल में एक बहुत बड़ा और सुंदर बगीचा था। नाना प्रकार केसु्दर-सुन्दर फूल खिले थे । पानी के रंगीन फटवारे उद्ल रहे थे । एक
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का नाम था वज़मुकुट । राजा का एक मंत्री था मंत्री के। एक ओट सुदर मदि बना था। शजकुमार बठीचे में आ गया। वह बहुतशक गया था । अतएव उसने बीचे में आशाम करना ठीक समझा ।अपना सुन्दर घोड़ा एक तरक बाधकर वह आशाम करने लगा, तभीतुम कौन हो?" शजकुमार ने अपना नकली परिचय देकर कहा,"भाई में एक मुसाफिर हूँ। बहुत दूर से आ हा हूँ, थक शया हूँ । थोड़ा आशाम कर लँ ।" माली बोला-"ओ बटोही! अभी रजकुमारी मंदिर में पूजा करने आयेगी, जल्दी से तुम हो जाओ। अगए शाजकुमारी ने तुमको देख लिया और वहजाराज हो गई, तो अपने साथ तुम मुझे भी मुसीबत में डाल दोगे।" वहबोला, "अच्छा मैं अभी चला जाऊँगा । शाजकुमार की बात पर मालीबेफिक्र होकर चला गया । शाजकुमार भी जाने के लिए अपने घोड़े कीबगीचे का माली उसके पास आया और बोला. जीन ठीक करने लगा। 

               बैताल बोला, "संयोग देखो कि इसी समय राजकुमारी अपने सहेलियों  के साथ मंदिर में पूजा करने के लिए आ गई । वज्रमुकुट ने उसेदेखा, तो देखता ही रह गया । ऐसी सुन्दर लड़की उसने पहले कभी नदेखी थी। शजकुमारी मंदिर में पूजा करने चली गयी। शजकुमार ठगा-शा खड़ा रह गया। पूजा कर जब राजकुमारी बाहर आयी, तो वह सबसेआठे थी। राजकुमारी की नजर उस पर गयी, वह भी उसे देखती रहठाई। फिर उसने पूजा कर कमल का जो फूल अपने सिर पर रखा था,हाथ में ले, कान से लगा, दॉँत से कुतर पैर तले खा। फिर उठाकर सीनेसे लगा लिया और चली गयी। वज्रमुकुट एकटक देखता रह गया। जबजकुमारी चली गयी, तो ठंडी सांस लेकर वह लौट पड़ा । भटकते-भटकते वह त्नशज से मिल गया । २त्नशाज उसे देखकर खुश हो गया।दोनों साथ हो गये। राजकुमार को उदास और खोया-खोया देखकरबोला, 'क्या बात है, शजकुमा? इतने उदास क्यों हो?" पहलेतो राजकुमार ने कुछ न बताया, पर २त्नराज के बार-बार पूछने परक्या तुम সरी घटना बतला दी। २त्नशज ने मुस्कश कर कहा-" अबचाहते हो?" "मैं उससे विवाह करना चाहता हूँ ।" त्नराज हॅसकरकहने लगा, "अपने मन में लड्डू फुटने लगे । उस शाजकुमारी ने तुमको,भी देखा होगा?" हाँ देखा था ।" "तुमको देखकर उसने क्या हरकत.की? बताओ, तो कुछ समझें।" शजकुमार ने सब बतला दिया कि किस.प्रकार कमका फूल उसने सिर से हटा, कान से लाया, दाँत से कावैं से दबाया, फिर Bाती से लकआया। त्ाज खुी से उछल ठअय.बोला, "मा लिया मैदान।" वजमुकुट आश्यर्य से उसका मुँह देखता इईम। बोला, "क्यों? तुमजे कैसे मतलब लगाया?" त्नाज बोला,"कबात बन आयी । विक्रम सुजो- तब जराज ने राजकुमार वजरमूकुट कोकि उस जकुमारी ने सिर से कमल का फूल उतार कान सेमतलब कजटिक की रहने वाली है और दोत से काटा तो मतलखदंतवादी बेटीहै।पौवतले दबाकर उसने अपना नाम बतलाया किउसका आम प्मावती है। अपने सीने से लगाया तो उसका मतलब है किवतुमको चाती है अथत् तुम उसके मनमंदिए में बस गये हो । वज्रमुकुटप्रस्सकं हो अया। उसकी खुी का ठिकामा न रहा । वह बोला "तब हसेंवहाँ चलना चाहिएबज प्रकार, हैजा विक्रम। राजकुमार और मंत्री पुत्र घोड़ोंपर सवादकोकर जा दंतवाव की नमरी में आये । रत्नराज ने पता लगानाकिया कि कौन औरत राजकुमारी के पास नित्य जाती है । बहुत खोज,पूछता के बाद उसे पता लगा कि एक बुढ़िया शजकुमारी के पास नित्यजाती है। दोों उसी के पास गये। उसके दरवाजे पर गुहार की । बुद़ियावाह आयी। तजराज बोला, "माई हम पर्देसी हैं । शाजा दंतराज काज देखजे की बड़ी द्छा है। तुम्हारे यहाँ क्या हम एक-दो रोज ठहरसकते हैं?" दो खूबसूरत भले नौजवानों को देखकर बुदिया बोली,तुमहारा मन है, तो ठह जाओ । मैं इस घर में अकेली ही रहती हूँ।"सुजो शजः क्रम, इस प्रकार वह दोनों बुढ़़िया के घर ूक गयेबुदिया जजकुमाडी की धाय माँ शी । उसने राजकुमारी को अपना दूधवि्ाया था। इज कारण वह दिन में एक बार राजकुमारी से मिलनेअव्य जाया करती थी बुद़िया राजकुमारी के पास जाने लगी, तो             बोला, "हमाी एक खबर शजकुमारी तक पहुॅचा देना।" वहबोली-"क्या कहना है?" रत्नराज बोला, "शाजकुमारी से कहना मंदिरमें जिसे देखा था, वह आ गया है ।" बुढ़िया बोली- "राजकुमारी नाराजको अई तो... मेटी ठादन उड़ा देगी ।" वह बोला, "ऐसा नहीं होगा माँ । "बुढ़िया माँ मागू गयी । बुदढ़िया जब शजकुमारी के पास गयी औरशाजकुमारी से इस बात को कहा, तो उसने चंदन लगा बुदिया के गाल परतमाचे मारे और धक्का मारकर निकाल विया । बुदिया घबराकर दोनोंके पास आई। बोली-"तुम लोगों ने तो मेरी जान मुसीबत में डाल दी ।क्या पता राजा अब क्या वड देगा मुझे? राजकुमारी तो नाराज हो गयी ।उसने मुझे तमाचा मारा और घर से निकाल दिया।" बुदिया की बातजुजकर राजकुमार घबर अया, किन्तु मंत्री का बेटा उत्नराज सखिल-खिलाकर हँस पड़ा। राजकुमार ने आংचर्य से पूछा - "तुम हैंस रहे हो,इसमें हैँसी की क्या बात है भाई?" उत्नराज बोला- "राजकुमारी नेस्खबर दी है कि पाँच रोज चाँदनी के बीते, तो खबर देना। फिरबताऊँगी।" बुढ़िया जब दूसरे दिन गई, तो राजकुमारी ने उसके साथमीठा बतवि किया। इस कारण बुद्िया का भी मन खुश हो गया। पाँचदिन बाद बुढिया को शाजकुमारी ने स्याही भरा तमाचा मार पश्चिम केदवाजे से धक्का मारकर निकाल दिया। बुढ़िया ने आकर सब कहा।
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तब त्जराज ने शजकुमार से पूठा- "भाई। इसका मतलब क्या है?"बोला, "आज आधी रत के समय पश्चिम के दरवाजे परआओ। तब मिलँगी।" राजकुमार खुश हो गया। राजा विक्रम सुनो।शाजकुमार आधी रात को तैयार होकर शजमहल के पश्चिम के दसवाजेपर गया। राजकुमारी उसका इंतजार कर रही थी । वह राजकुमार कोअपने साथ भीतर ले गयी । शाजकुमार अगले दिन वापस आया तो बड़ाउदास था। उसे देखकर त्नशज बोला, "मित्र अपनी प्रेमिका सेमिलकर आने के बाद भी तुम इस प्रकार उदास हो? तुमको तो खुशा होनाचाहिए। आखिर क्या बात हो गयी?" शाजकुमार बोला, "शजकुमारीमुझे बहुत प्यार कश्ती है, पर उसका कहना है कि उसका पिता मेरे साथविवाह नहीं करेगा। एक, दूसरे शजकुमार से उसका विवाह पक्का होकी गया है। बोलो, क्या करना?" त्नराज, राजकुमारबात बोला, "शोचने का मौका दो, कोई न कोई उपाय निकल ही आयेगा।"ने त्नशज बोला-"अब तुमको कब आने को कहा है?"बतलाया, "कल बुलाया है।" अगले दिन राजकुमार वज्रमुकुट, जानेलगा, तो त्नराज ने उसे एक त्रिशूल देकर कहा, "शाजकुमारी जब सोजाये, तो यह त्रिशुल उसकी जाँघ पर मारकर उसके सारे जेवर उतारलाओ।" वज्रमुकुट पहले तो हिचकिचाया पर बाद में मान गया । उसनेऐजा ही किया। राजकुमारी की जाँघ में त्रिशूल मार, उसके जेवर ।उ क वह भाठा आया। उसके आजे के साथ ही २त्नशज ने योगीवेश बजाया और eाजकुमा को अपना चेला बनाकर रवय एक मठ में ।वला गया और जाकर धूजा २मा दा। कि शाजकुमार से बोला कैका के इन जेवरों को बाजार में बेच आ ।" शजकुमार बाला,।तो राजकुमारी के जेव हैं । मैं पकड़ा जाऊँगा ।" यही तो मेडीइच्छा है। जब लोग तुझे पकड़े तो मेश नाम बता दंना कि गुरुजी नेहैं। राजा के सिपाही मेरे पास आयेंगे, तो में निपट लूँगा । "विक्रम, शजकुमार जब जेवरात बेचन बाजार में गया, तो रीजौही की जौहरी जे उसे पकड़ लिया और सिपाहियों के हवाले कर दिया। रगेकहा. "जेवर मेरे गुरु ने मुझे बेचने के लिए दिए हैं।" सिपाही बोे"तुम्हारा गुरु कौन है?" वह बोला, "मेरे साथ चलो, मैं, दिखाता हूँ।"शाजकुमार सिपाहियों के साथ मठ पर ाया। सिपाहियों ने रत्नशज को
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भी हिरासत में लेकर शाजा के सामने पेश किया। शजा ने पूछा, "तुम्हारेपास जेवशत कहाँ से आये?" रत्नराज बोला "महाराज! रात को एकचुडेल मेरे पास आयी थी। मैंने उसकी जाँघ पर त्रिशुल मारकर उसके सबजेवर उतरवा लिए। शजा आश्चर्य में पड़ ठया। उसने पता कियाजकुमारी की जाँध पर त्रिशुल का निशान था । बस् क्या था । राजा नेउसे जंगल में छोड़ दिया। शाजकुमार उसके पास गया । पहले तोरजकुमारी बड़ी नाशाज हुई। बाद में सब जानकर खुश हो गयी । सुनोविक्रम! इस प्रकार शजकुमार, राजकुमारी को अपने साथ ले गया।" उससे विवाह कर सुखपूर्वक रहने लगा । अब बोलो-"इनमें दोषकिसका है?" विक्रम ने कहा, "सुनो बैताल! मंत्री के बेटे ने अपनी वोस्तीनिभयी। जिपाहियों ने शजा का हूक्म माना । इसमें दोष शाजा का हैउसने विना सोचे-समझे अजकुमारी को निकाल दिया।" "तुम ठीककहते हो। और बैताल भयानक अट्टहास करता शाजा के कधे सेउतकर आग ठया और उसी व्रक्ष पर जाकर फिर उल्टा लटक गया।


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