Hatim tai । Stories of Hatim tai । हातिमताई । Kahaniya

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 हातिमताई का जन्म और शोहरत 

यमन देश में निहायत साहब नाम का एक बादशाह था। विवाह के
कई सालों के बाद उनकी बेगम ने एक चाँद से लड़के को जन्म दिया,
जिसका नाम हातिमताई रखा गया। बादशाह सलामत के सन्तान होने
की खबर समूचे राज्य में बिजली की तरह फैल गई और समस्त प्रजा
खुशियों के आलम में डूब गई। ज्योतिषियों ने बादशाह से कहा कि ये
बालक कल का महान बादशाह होगा और समस्त संसार में सदैव के
लिए अपना नाम रोशन रखेगा। धीरे-धीरे हातिम माँ-पिता के
प्यार में पलकर जवान हुआ और जवानी में उसका हुस्न ऐसा चमका
कि उसकी खूबसूरती और बहादुरी की शोहरत सारे संसार में फैल गई
और परोपकारी वो ऐसा निकला कि किसी भी जीव के लिए अपने प्राण
भी देने को तैयार हो जाता था। उसने जो परोपकार किये उसी का एक
किस्सा ये पुस्तक की कहानी भी है।

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 हुटनबानू की कहानी व 
 शादी के लिए सात सवालों की शर्त 


देश खुरासान में एक अच्छा बादशाह था, जिसकी हुकूमत में शेर
और बकरी एक घाट पर साथ-साथ पानी पीते थे। न्याय के अवसर पर
वह अपने पुत्र का भी पक्षपाती नहीं बनता था। उसके शहर में सौदागर
बरखज रहता था जो बादशाह का मित्र था। उसके गुमाश्ते हर एक देश
में सौदागरी करते थे। उस सौदागर की एक बेटी हुस्नबानू के सिवाय
और कोई संतान नहीं थी।
          ईश्वर की माया बड़ी विचित्र है। अपनी प्यारी बेटी को १२ वर्ष की
उम्र में इस संसार में छोड़कर सौदागर स्वर्ग सिधार गया। मरने से पहले
ही उसने राजा से कहा कि-'महाराज ! अब मेरी बेटी की रक्षा आपके
हाथ में है।' अब तो अपने पिता की सारी दौलत व जायदाद की मालिक
को बादशाह अपनी पुत्री की तरह पालने लगा। कुछ समय
हुस्नबानू पश्चात जब हुस्नबानू जवान हुई तब अपनी धाय से बोली कि-'हे
माता ! यह संसार पानी का बुलबुला है, न मालूम कब फूट जाये। यह
धन मेरे किस काम का? मैं चाहती हँ कि इस धन को परमेश्वर की राह
में लगा दूँ और हमेशा अनब्याही रहूँ, जिससे कि मेरा हृदय सृष्टि के विकारों
से पवित्र रहे।'
          इतनी सुन धाय कहने लगी कि-' बेटी! यदि तू यही चाहती है
तो अपने मकान के दरवाजे पर सात सवाल लिखकर टॉँग दे और उन सात
सवालों के नीचे यह लिख दे कि जो इनका जवाब देने में सफल होगा उसी को
पति बनाऊँगी, नहीं तो सदा कुँवारी रहूँगी। सात सवाल ये हैं-

१. एक बार देख लिया पर दूसरी बार देखने की इच्छा है।
२. नेकी कर दरिया में डाल।
३. किसी के साथ बुराई मत कर, जैसा करेगा वैसा भरेगा।
४. सच बोलने वाला सदा सुख पाता है।
५.कोहनिदा का पहाड़ जिसमें से आवाज निकलती है, उसकी खबर लाकर दे।
६. जोड़ा मिला दे उसका कि जो मोती जल मुर्गी के अण्डे के समान है।
७. हमामबाद-गिर्द की खबर ला दे।'

हुस्नबानू ने प्रसन्न होकर अपनी धाय की बात को स्वीकार
किया और सातों सवाल लिखकर दरवाजे पर टाँग दिये।
कुछ दिन बाद हुस्नबानू संयोग से अपनी हवेली की छत पर खड़ी थी
 कि क्या देखती है कि एक साधु अपने चालीस चेलों के साथ
सड़क पर जा रहा था। धरती पर पाँव नहीं धरता, उसके चेले
सोने-चाँदी की ईंट सामने रखते थे और वह साधु उन इंटों पर
पॉव रखकर चलता था।
          सौदागर की बेटी उसक् दर्शन करके फूली न समाई
और अपनी बतलाया कि-'यह साधु तो बड़ा ही पहुँचा हुआ
धाय को बुत मालूम होता है, जो सोने-चाँदी की ईंटों पर पाँव रखकर चलता है।'
धाय बोली- यह बादशाह का गुरु है, बादशाह को दर्शन देने के लिये दरबार में जा रहा है।'
          यह सुनकर हुस्नबानू कहने लगी किं-'माता! यदि आपकी आज्ञा हो
तो किसी दिन साधु को अपने यहाँ बुलाकर और खाना खिलाकर अपने
घर को पवित्र कराएँ?' धाय बोली- बेटी! यह तो बड़ी अच्छी बात है। हुस्नबानू
ने उस साधु को सन्देश भेज दिया कि- कल आप अपने समस्त
चेलों के साथ मेरे घर पधारें और भोजन करने की कृपा करें।'
          साध ने निमंत्रण स्वीकार कर लिया और दूसरे दिन हुस्नबानू ने
उसके सम्मान की तैयारी की। बड़े उत्तम प्रकार के भोजन बनाए और
सोने-चाँदी के थालों में उस साधु और उसके चेलों को भोजन कराया।
साधु भोजन करते समय यह सोच रहा था कि-'बरखज सौदागर की
बेटी बड़ी मालदार लगती है। इस घर में धन का अम्बार है। आज ही रात
को कोई ऐसा उपाय करता हूँ कि यह सारी धन

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          उस ढोंगी साधु ने रात को अपने चेलों के साथ हुस्नबानू का सारा
धन लूट लिया और उसके नौकरों को घायल करके भाग गया। सवेरा
होते ही हुस्नबानू अपने घायल नौकरों को लेकर बादशाह के दरबार में
गई और उस ढोंगी साधु का सारा हाल कह सुनाया। इस पर बादशाह ने
उसी पर क्रोधित होकर कहा कि-'ऐसे महान साधु को तू चोर और
लुटेरा बताती है।' हुस्नबानू ने यकीन दिलाने की कोशिश बहुत की,
परन्तु बादशाह ने उसकी कोई बात न सुनते हुए हुस्नबानू का सारा धन
छीनकर उसे देश से निकालने का हुक्म दिया, क्योंकि बादशाह उस
ढोंगी साधु का अनन्य भक्त था।
          हुस्नबानू देश को छोड़कर अपनी धाय के साथ चलते-चलते एक
जंगल में पहुँच गई और एक पेड़ के नीचे सो गई। रात को हुस्नबानू को
सपना आया- पेड़ के नीचे खजाना गड़ा हुआ है, इसे खोदकर तू
निकाल ले और अपने काम में ला।'हुस्नबानू ने सुबह उठकर उस पेड़ के
नीचे दबा खजाना खोदकर निकाल लिया। तभी हुस्नबानू का एक
वफादार नौकर उसे ढूँढते-ढूँढते वहाँ आ गया और अपने साथ बाकी
नौकरों को भी ले आया। हुस्नबानू ने उस दौलत से एक आलीशान
मकान बनवाया और वहाँ हँसी-खुशी रहने लगी।
          एक दिन हुस्नबॉनू मर्दाना भेष बनाकर दरबार में पहुँची। द्वारपालों ने
बादशाह को सूचना दी कि कोई सौदागर दर्शन के लिए आया है।
ने कहा- 'उसे हमारे पास ले आओ' मर्दाने भेष में हुस्नबानू ने बादशाह को
प्रणाम किया। अपनी बातों द्वारा उसने बादशाह का विश्वास जीत लिया।
एक दिन बादशाह उसी ढोंगी साधु के दर्शन को जा रहे थे तो हुस्नबानू भी
बादशाह के साथ चल दी मगर रास्ते में सोचने लगी कि ऐसे पापी के दर्शन
करना महापाष है। बादशाह ने हुस्नबानू को अपना बेटा बना लिया था और
उसका नाम मारूशाह रख दिया था। बादशाह ने उस ढांगी साध की बहन
प्रशंसा की और परिचय दिया। मारूशाह ने अपने पिता का घर बादशाह
से कहकर ले लिया और उस ढागी को अपने घर पर भोजन करने का
निमंत्रण दिया। जब साधु अपने चेलों सहित मारूशाह के घर पहुँचा तो
उन्हें सोने-चाँदी के थालों में भोजन कराया गया।
          भोजन करने के बाद साधु ने सोचा कि-'इन सोने-चाँदी के थालों
को कैसे चुराया जाए?' इधर हुस्नबानू ने कोतवाल को पहले ही
खबरदार कर दिया कि- आज रात मेरे घर में चोरी होने वाली है।' ढोंगी
साधु अपने चेलों के साथ हुस्नबानू के मकान में आया और सारा धन-
दौलत बाँध लिया और गठरी बाँधकर चलने लगा, तभी हुस्नबानू ने
शोर मचाया और सारे सिपाही दौड़कर मकान में आ गये सब चेलों
सहित उस ढोंगी साधु को पकड़कर कोतवाली में लाया गया। सुबह
हुस्नबानू भी बादशाह के सामने आई। उसको देखकर बादशाह बोला-
बेटा मारूशाह! रात को तुम्हारे यहाँ डाका पड़ गया?
          यरह सुनकर हुस्नबानू कहने लगी-'हाँ पिताजी! यदि कोतवाल न
पहुँचते तो मैं बिल्कुल लुट जाता।' बादशाह ने कोतवाल से कहा कि-
'जल्दी से जाओ और उन डाकुओं को मेरे सामने लाओ।' यह सुनकर
कोतवाल ने सब डाकुओं को बादशाह के सामने पेश किया। बादशाह
अचम्भित होकर बोल उठे- अरे! ये तो हमारे गुरु और उनके चेले हैं।
पर बाद में साधु की असलियत जानकर बादशाह ने क्रोध में आकर
कहा कि-'इन सब पाखंडियों को जल्दी सूली पर चढ़ा दिया जाए,
जिससे फिर कभी कोई ऐसा पाखण्डी साधु न बने। '
          बादशाह की आज्ञा से सारे पाखंडी सूली पर चढ़ा दिए गए।
बादशाह का इन्साफ देख हुस्नबानू प्रसन्न होकर बोली-'सरकार! मैं
बरखज सौदागर की बेटी हुस्नबानू हूँ, उस समय में निरपराध थी, पर
आपने मेरी बात पर विश्वास न करके मुझे शहर से निकाल दिया, अब
आप किसी दिन पधारकर मेरे घर को पवित्र बनावें|' बादशाह ने प्रसन्न
होकर कहा- अवश्य ही आऊँगा।' अब हुस्नबानू मर्दाना भेष को त्याग
कर अपने शहर में सुखपूर्वक रहने लगी।

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          कुछ दिन बाद हुस्नबानू के सातों सवालों की ख्याति ख्वारजिस देश
तक फैल गई। वहाँ का बादशाह बड़ा तेजवान था। उसका शहजादा
मुनीरशामी था, जब उसने हुस्नबानू के हुस् की तारीफ अपने कानों से
सनी तो उससे शादी करने को व्याकुल हो वह हुस्नबानू के घर पहुँच
गया। हुस्नबानू ने उसे अपनी शर्ते बताई। शर्त के अनुसार वह सातों
सवालों के जवाब लेने गया मगर नाकामयाब रहा। तब हुस्नबानू ने
उससे शादी करने से इंकार करके अपने महल से निकाल दिया।
शहजादा हुस्नबानू के विरह में पागल-सा हो गया।
     दोहा-मर्ज विरह का बुरा दे न किसी को राम।
            चैन नहीं जिसको पड़े निश दिन आठों धाम॥
   वह जंगलों में भटकता फिरने लगा, भूख लगने पर जंगली फलों
और पत्तों को खा लेता।
          एक दिन मुनीर अपनी प्यारी के विरह में एक पेड़ के नीचे बैठा रो
रहा था, इतने में वहाँ मुल्क यमन का शहजादा, जिसका नाम हातिम
था, शिकार खेलता आ पहुँचा। पेड़ के नीचे उसे जोर-जोर से रोता देख
हातिम को दया आ गई। उसने मुनीर से पूछा-'भाई! तू कौन है? जंगल
में इस पेड़ के नीचे क्यों रो रहा है?' यह सुन मुनीर बोला- हे भाई! मैं
मुल्क ख्वारजिस का शहजादा हूँ और अपने रोने का कारण तुम्हें कैसे
बताऊँ? कुछ बता नहीं सकता और बताने से क्या लाभ? मेरे दुःख को
दूर करने वाला संसार में कोई नहीं।'
          इस बात को सुन हातिम ने कहा-'हे शहजादे! तू मुझे पूरी बात बता,
मैं अवश्य ही तेरे दुःख दूर करुँगा।' यह सुनकर मुनीर ने कहा-'मेरा
नाम मुनीरशामी है। ऐसा कह उसने हातिम के सामने हुस्नबानू का चित्र
रख दिया और कहा-
      दोहा- इस बिन मैं कैसे जिऊँ तू ही हृदय विचार।
            हातिम अब बोला वचन सुन्दर चित्र निहार।॥।
     'अच्छा मुनीरशामी, तू इसके विरह का दुःखिया है, चिन्ता न कर,
यह सुन्दरी तुझे अवश्य मिलेगी। तू विश्वास कर, जब तक इसे तुझसे
मिला न दूँगा, तब तक तेरा साथ न छोड़ेंगा।' हातिम मुनीरशामी को
अपने साथ ले गया। उसे नहला-धुलाकर खाना खिलाया। तीन-चार
दिन बड़े आदर से उसे रखा फिर कहा-' प्यारे मित्र! अब मै तुम्हारे दुःख
को दूर करने का प्रयत्न करुँगा' और ऐसा कह मुनीर को साथ लेंड
हातिम शाहबाद की ओर चल दिया और चन्द रोज में वह चलते-चलते ।
उस शहर में पहुँच गया।

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          उसने हुस्नबानू के गुलामों द्वारा उनके पास संदेश पहुँचवाया कि-
     'मैं उसके सवालों के जवाब लाकर दूँगा।'
हुस्नबान गुलाम हुस्नबानू के पास भागे-भागे गए और सरान
हाल कह सुनाया| हुस्नबानू ने दोनों मुसाफिरों को पास लाने को कछा
और आप पर्दे के पीछे बैठ गई और दोनों को पर्दे के बाहर बिठा दिया.
तब सौदागर की बच्ची ने पूछा कि-'तुम कौन हो और क्या चाहते हो?'
हातिम बोला-'मैं मुल्क यमन का शहजादा हातिम हूँ और मेरे साथ
ख्वारजिस का शहज़ादा मुनीरशामी है, जो तुम्हारे विरह में बेचैन है।
बिन तुम्हारे मुख को देखे यह जीवित नहीं रह सकता। इसलिए हे
सुन्दरी! दया करो और इसे अपना चेहरा दिखाकर जीवन दान दो।'
हुस्नबानू बोली-'ऐसा कदापि नहीं हो सकता कि किसी अनजान पुरुष
को मैं अपना मुँह दिखाऊँ। जो मेरे सात सवालों का जवाब देगा उसी को
मैं अपना मुँह दिखाऊँगी और उसी के साथ शादी करूँगी।' यह सुनकर
हातिम ने कहा-'मैं तुम्हारे सातों सवालों का जवाब दूंगा, परन्तु शर्त यह
है कि जिसके साथ चाहूँगा, उसी के साथ तुम्हारी शादी कराऊँगा।'
हुस्नबानू बोली- मुझे स्वीकार है।' तब हातिम ने पूछा-'तुम्हारा पहला
सवाल क्या है?"
          हुस्नबानू ने कहा-'पहला सवाल है-एक बार देखा है, दूसरी बार
देखने की इच्छा है। इसका जवाब दें।' हातिम बोला-'सुन्दरी, मैं जवाब
ढूँढने जाता हूँ और अपने मित्र को तुम्हारे पास छोड़ता हूँ और जब तक मैं
न आऊँ, इसे किसी भी प्रकार का दुःख न हो।' यह कहकर परोपकारी
हातिम वहाँ से चल दिया।



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