Birbal ki khichdi kahaniya in hindi अकबर को बीरबल मिला कहानी हिंदी

Birbal ki khichdi kahaniya in hindi 

अकबर को बीरबल मिला कहानी हिंदी 


Birbal ki khichdi kahaniya in hindi अकबर को बीरबल मिला कहानी हिंदी

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Birbal ki khichdi kahaniya in hindi अकबर को बीरबल मिला कहानी हिंदी 


एक बार बादशाह अकबर युद्ध के बाद दिल्ली लौट रहे थे | रास्ते में अकबर को इलाहाबाद के गंगा किनारे पर पड़ाव डालना पड़ा | अकबर को खेमा पूरी पॉज के साथ गंगा के किनारे पर जमा हुआ था |

          दूसरे दिन अकबर ने अपने एक दूत को एक पत्र के साथ नाव पर झूसी के राजा के पास भेजा | पत्र वाहक ने झूसी के किले में पहुंचकर अकबर का पत्र झूसी के राजा को दे दिया |
          पत्र में अकबर ने कुछ अधिक नहीं लिखा था उसने बस केवल यहां के राजा से मिलने की इच्छा व्यक्त की थी |
          झूसी सम्राट अर्थात चौपट राजा, अकबर के पत्र को पढ़कर बुरी तरह से घबरा गया | उसने समझा की अकबर उसके छोटे से राज्य पर अपना अधिकार करना चाहता है !
          चौपाटी राजा ने तुरंत बीरबल को बुलाया और यह पत्र बीरबल के आने पर उसके समक्ष रख दिया | साथ ही अपना भय भी प्रकट कर दिया | की उसे शक है की अकबर उसके छोटे से राज्य को अपने अधिकार में करना चाहता है |
बीरबल !
बीरबल दूरदर्शी था | वह अकबर के आशय को समझ गया था उसने हंस कर कहा महाराज ऐसी बात नहीं है |अकबर की इच्छा आपके छोटे से राज्य पर अधिकार करने की नहीं है |
"फिर क्या है बीरबल?"
       
"आप  चिंतित न हो महाराज |" बीरबल ने उत्तर दिया, अकबर महाराज की जो इच्छा है, वे जिस इच्छा से आपको बुला रहे हैं, मैं उसका अभी प्रबंध कर देता हूं |"
     "तुम जानो बीरबल, जो चाहे करो |"
     "महाराज !"
     "बोलो बीरबल |"
     "आप चलने की तैयारी करें |" बीरबल ने कहा,
"महाराज अकबर से मिलने तो चलना ही है |"
      "क्या हमारा चलना भी आवश्यक है बीरबल ? |"
      "जी हां महाराज !"
चौपट राजा तो अकबर से मिलने जाने के लिए अपनी तैयारी में लग गए | और बीरबल...|
          बीरबल वह प्रबंध करने चला गया, जो उसने सोचा था | राजमहल से निकलकर बाहर मच्छरों की बस्ती में आ गया | वहाँ आकर उसने कुछ किश्तियों में ईंट, पत्थर, चूना तथा मिस्त्रियों को गंगा किनारे पर पहुँचने का आदेश दिया।
     बीरबल अपना कार्य करके लौट गया। उसने राजमहल में आकर महाराजा से कहा, "महाराज ! हम लोग दो-तीन घंटे
बाद चलेंगे।"
"बीरबल!" महाराज बोले, "यदि हम लोगों को वहाँ पहुँचने में देरी हुई तो सम्राट अकबर नाराज़ हो सकते हैं।"
     "आप निश्चिन्त रहिये।" बीरबल ने कहा, अकबर नाराज़ नहीं होंगे।"
चौपट राजा कर भी क्या सकता था? उसके पास अपनी अक्ल तो थी नहीं। जैसा बीरबल ने कहा उसने मान लिया। चौषट महाराज तथा बीरबल तीसरे पहर अकबर से
मिलने के लिए एक शाही किश्ती से चले।
      दूर से ही सम्राट-अकबर के खेमे नज़र आ रहे थे। वहाँ अकबर का झण्डा लहरा रहा था। कुछ देर बाद महाराज और बीरबल अकबर के समक्ष पहुँच गये। चौपट राजा तथा बीरबल ने अकबर को प्रणाम किया।
      अकबर ने चौपट राजा तथा बीरबल को शाही खेमे में
अपने साथ बैठाया और उनकी आवभगत की। चौपट राजा ने अकबर के समक्ष हाथ जोड़कर कहा,
"महान सम्राट ने मुझ जैसे गरीब को कैसे याद किया? मैं जिस लायक हूँ, आपकी सेवा में उपस्थित हो गया हूँ, लेकिन महाराज मेरी समझ में यह बात नहीं आई कि आप जैसे महान सम्राट ने मुझ जैसे गरीब छोटे से राजा पर क्यों कुपित दृष्टि डाली? मेरे इस छोटे से राज्य में आप जैसे सम्राट को क्या
मिलेगा?"
     अकबर चौपट राजा की बातें सुनता रहा। उसकी बातें सुनकर उसने मुस्कराकर कहा, "आप जो कुछ सोच रहे हैं। वैसा कुछ नहीं है। आपके राज्य को अपने अधिकार में लेने का हमारा कोई इरादा नहीं है। लेकिन...।"
      "लेकिन क्या महाराज?" चौपट राजा ने पूछा।
      "हम यह जानना चाहते हैं कि हमने तो केवल तुम्हें
बुलाया था? फिर तुमने स्वयं आने के पूर्व ये ईंट पत्थर, चूना
आदि क्यों भिजवाया?"
     महान सम्राट!" चौपट राजा ने कहा, " मुझे इस विषय । में कोई ज्ञान नहीं है। सच्ची बात तो यह है कि मेरे राज्य में जो कुछ भी करते हैं मेरे मंत्री बीरबल करते हैं।"
     अब अकबर ने बीरबल पूछा, "बीरबल तुमने स्वयं
आने के पहले ये ईट, पत्थर, चूना आदि क्यों भिजवाया?"
     बीरबल  ने अकबर के समक्ष जोड़कर कहा,"महाराज! आपने हमारे महाराज को इसी उद्देश्य के लिये
तो बुलाया था ना? आपकी इच्छा इन तीनों नदियों के किनारे पर एक विशाल महल बनाने की ही थी ना?"
     "ये सही है बीरबल।" अकबर ने कहा, "हमारी यही इच्छा थी। हम गंगा, यमुना और सरस्वती के किनारे पर एक विशाल किला बनाना चाहते हैं।" अकबर, बीरबल की बुद्धिमत्ता को पहचान गया था।
अकबर ने बीरबल को अपने साथ रखने का फैसला कर लिया।
     उन्होंने महाराज चौपट की ओर देखते हुए कहा, "महाराज! बीरबल आज से हमारे साथ रहेंगे। इनको हम
अपने साथ ले जाएँगे।"
     अकबर की इस बात को सुनकर चौपट राजा रो पड़ा।
उसने गिड़गिड़ाकर कहा, "महाराज! मेरे पास तो जो कुछ है बस बीरबल ही है। इन्हीं के बल पर तो मैं राज्य करता हूँ। बीरबल को मुझसे मत छीनिये।"
     लेकिन अकबर ने चौपट राजा की यह प्रार्थना स्वीकार
नहीं की। उन्होंने कहा, "यदि तुम स्वेच्छा से बीरबल को हमें नहीं दोगे तो हम तुम्हारे राज्य की ईंट से ईंट बजा देंगे। हम बीरबल की बुद्धिमत्ता पर मुग्ध हैं और हर सूरत में इनको अपने साथ लेकर ही जायेंगे। वैसे भी तुम्हारी अंधेर नगरी में क्या फर्क पड़ता है? बीरबल जैसे बुद्धिमान व्यक्ति को तो हमारे साथ दिल्ली में रहना चाहिये।"
      बेचारा चौपट राजा भी क्या कर सकता था। उसका
बादशाह अकबर के समक्ष वजूद ही क्या था?
      वह चुपचाप लौट गया।
      झूसी यानी अंधेर नगरी के इतिहास में बताया जाता है कि अकबर के बीरबल को अपने साथ ले जाने के पश्चात् कुछ ही दिनों में अंधेर नगरी के चौपट राजा का अन्त हो गया। राजा का किला उलट गया और चौपट राजा सहित सब समाप्त हो गया। 
झूसी यानी अंधेर नगरी का वह किला आज भी उलटा पड़ा है। बताया जाता है कि उस किले में से एक सुरंग गंगा के नीचे त्रिवेणी किनारे तक जाती थी।
     अकबर ने जो किला बनवाया था वह आज भी गंगा- यमुना के किनारे पर खड़ा हुआ है। 
     इलाहाबाद के उस विशाल किले की शुरुआत सम्राट अशोक महान ने करवाई थी, जिसे अकबर ने पूरा किया था। इलाहाबाद के किले से एक सुरंग दिल्ली के किले तक गई थी, जो सुरक्षा की दृष्टि से बनाई गई थी। अकबर बीरबल  को लेकर दिल्ली आ गया था। इस तरह से बादशाह अकबर को बीरबल जैसा रत्न प्राप्त हो गया।
      बीरबल बहुत ही बुद्धिमान व्यक्ति थे। वह अकबर के नौ रत्नों में से एक थे और अकबर को अपने सभी सभासदों से प्रिय थे। बीरबल बुद्धिमान, हाजिर जवाब तथा तार्किक रूप में उत्तर देने के आदी थे। वह अकबर की बातों का सहज ही उत्तर दे देते थे। अकबर और बीरबल के मध्य जो मजेदार बातें होती थी, उन्हीं को अकबर-बीरबल के लतीफे कहा जाता है। अब लीजिये अकबर-बीरबल के लतीफों का आनंद.........



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